खुदगर्ज एक लघुकथा
खुदगर्ज
एक लघुकथा
एक दिन मोहित थका-हारा भीम ताल के किनारे टहल रहा था। कुछ समय बाद उसका गला प्यास के कारण सूखने लगा तो ताल के एक किनारे पर जाकर वह
झुककर पानी पीने लगा।
लेकिन यह क्या? पानी तो बहुत गंदा था, पत्तियां और प्लास्टिक के टुकड़े उसमें गिरे थे। उसने थोड़ा आगे बढ़ कर पानी पीना चाहा तो उस जगह भी पानी में कागज के टुकड़े, सड़े हुए फल-फूल के अंश दिखाई दिए। वह क्रोध में चीख पड़ा, छिः ! कितना गंदा पानी है।
गुस्से में भरी चीख सुनते ही ताल के जल में एक आकृति उभरी। उस आकृति ने मोहित से कहा कि मेरा जन्म तो प्राणियों में जीवन- संचार के लिए ही हुआ था लेकिन तुम मनुष्यों ने ही मुझे कूड़ादान बनाकर मेरी निर्मलता को मलिन कर दिया है। उधर देखो.। यह कहकर आकृति ने ताल के दूसरे किनारे की तरफ हाथ
से इशारा किया और वह बोली, 'कपड़े धुलाई से लेकर चमड़े की धुलाई, यहीं बैठकर होती है। कारखानों से निकला कचरा भी मुझमें ही प्रवाहित किया जाता है। गंदगी ढोते-ढोते में कितनी थक जाती हूं तुमने कभी सोचा? अपनी सफाई का इतना खयाल हैं, कभी मेरी सफाईके बारे में भी सोचा? गंदा करने को अपराध तुम करते हो और दोष मुझ निरीह परलगाते हो। यह कहकर वह आकृति विलीन हो गई और प्रशांत किंकर्तव्यविमूढ हो गया।
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